पंचभूतों के फंदे में पड़कर ब्रह्म भी रोते हैं – स्वामी मुक्तिनाथानंद जी

प्रेस विज्ञप्ति..
दिनांक-13-05-2024

लखनऊ।

ईश्वर भी मानव शरीर धारण करते हुए रोग-शोक के वशवर्ती होते हैं-स्वामी जी

सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने बताया कि श्री रामकृष्ण की अंतिम बीमारी के समय उन्होंने स्वयं उनके अंतरंग भक्तों से पूछा, “अच्छा रोग क्यों हुआ?” यद्यपि उनके एक अंतरंग भक्त मास्टर महाशय ने उत्तर दिया, “आदमी की तरह अगर सब बातें न हुई तो जीवों में साहस फिर कैसे होगा?” इसके उत्तर में श्री रामकृष्ण ने कहा, “बलराम ने भी कहा आप ही को अगर यह है तो हमें फिर क्यों नहीं होगा?”
अर्थात ईश्वर जब नर शरीर धारण करते हैं तब अन्य साधारण जीवों के जैसे वे रोग-शोक अपनाते हुए दिखाते हैं कि कैसे रोक-शोक के बावजूद मन को ईश्वर केंद्रित रखा जाए। जब ईश्वर श्री रामचंद्र के रूप में अवतरित हुए थे तब उनके जीवन में भी सीता हरण के उपरांत चरम शोक सहन करना पड़ा। इसका उल्लेख करते हुए श्री रामकृष्ण ने कहा, “सीता के शोक से जब राम धनुष न उठा सके तब लक्ष्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ। परंतु पंचभूतों के फंदे में पड़कर ब्रह्म को भी आंसू बहाना पड़ता है।”

अर्थात मायाधीश ईश्वर जब माया का अवलंबन करते हुए मायाधीन होकर नर शरीर धारण करके इस जगत में प्रकट होते हैं तब वे प्रकृति की नियमावली के अंतर्गत होकर साधारण जीवों के जैसे व्याधि में पीड़ित होते हैं एवं प्रियजन के विरह में शोक भी करते हैं।
स्वामी जी ने बताया कि उदाहरण स्वरूप श्री रामकृष्ण ने उल्लेख किया कि सीता हरण के बाद वनवास काल में श्री रामचंद्र अतीव दुःखी हुए एवं उनका शारीरिक बल इतना कम हो गया कि अपना धनुष भी उठाने में वे असमर्थ हो गए। वैसे ही हम श्री रामकृष्ण के जीवन में देखते हैं कि जब उनके भतीजा अक्षय का देहांत हुआ था तब श्री रामकृष्ण भी दुःख के सागर में डूब गए थे। श्री रामकृष्ण के अग्रज श्री रामकुमार चटोपाध्याय के पुत्र अक्षय अत्यंत सुदर्शन व पारदर्शी युवा थे एवं दक्षिणेश्वर में पूजा के कर्म में नियोजित हुए थे। मात्र अट्ठारह वर्ष की आयु होते ही अक्षय अचानक कठिन पीड़ा के कारण शरीर छोड़ दिया। श्री रामकृष्ण ने उनके देहांत के कारण इतने दुःखी हो गए कि लगातार तीन दिन वे अपनी शैय्या से नहीं उठ पाए। इसके उपरांत उन्होंने कहा, “अगर मेरा इतना शोक का वेग हो रहा है तो साधारण जीव कैसे अपने प्रियजन के विरह में संभल रहे हैं? यह आश्चर्य की बात है!”
स्वामी मुक्तिनाथानंद जी ने कहा ईश्वर भी मानव शरीर धारण करते हुए जब रोग-शोक के वशवर्ती होते हैं, तब साधारण जीवों को जीवन के अनिवार्य अंग रोक-शोक को शांत मन से ग्रहण कर लेना चाहिए एवं कोई भी अवस्था में व्याकुल एवं संतुलित मन से ईश्वर के चरणों में आंतरिक प्रार्थना करना चाहिए ताकि उनकी कृपा से हम इस जीवन में ही ईश्वर को प्रत्यक्ष करते हुए जीवन सफल और सार्थक कर सकें।

स्वामी मुक्तिनाथानन्द

अध्यक्ष
रामकृष्ण मठ लखनऊ।

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