मुख्यमंत्री गहलोत पर काला जादू करने का आरोप…

डे नाईट न्यूज़ । जयपुर की एक अदालत ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर जादू टोटके करने का आरोप लगाने वाली एक पुनरीक्षण (रिवीजन) याचिका खारिज कर दी है। अतिरिक्त सत्र न्यायालय (क्रम-7) ने इस मामले में अधीनस्थ अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि परिवादी ने पूरी तरह काल्पनिक आधार पर वाद पेश किया है।

दरअसल आशीष सैनी ने इस बारे में निचली अदालत में एक वाद दायर किया था। इसके अनुसार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पिता लक्ष्मण सिंह से जादूगरी सीखी जो परिवादी के शरीर में भिन्न-भिन्न प्रकार से जादू चला रहे हैं और दूर से ही उन पर जादू कर रहे हैं।

गहलोत को अभियुक्त बनाते हुए वाद में कहा गया था, इसके असर से परिवादी सैनी कभी हकलाकर बोलता है, कभी नाक से बोलता है, कभी तुतलाकर बोलता है, कभी गूंगा हो जाता है, बोलने का प्रयास करने पर भी बोल नहीं पाता है। ये सब क्रिया यह सब अभियुक्त के काले जादू टोने टोटकों का प्रभाव है।

अधीनस्थ अदालत ने इस याचिका को काल्पनिक बताते हुए खारिज कर दिया था। सैनी ने अधीनस्थ अदालत के फैसले के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर की।

अदालत ने अपने आदेश में लिखा है,’परिवादी द्वारा परिवाद में किये गये कथनों से परिवादी के सम्बन्ध में किसी प्रकार का कोई अपराध किया जाना प्रथम दृष्टया प्रकट नहीं होता है। परिवादी ने यह परिवाद पूर्णतया काल्पनिक आधारों पर प्रस्तुत किया है, जिससे किसी व्यक्ति द्वारा अपराध करना नहीं पाया जाता है। अतः परिवाद को धारा 156(3) द.प्र.सं. के तहत अन्वेषण हेतु भेजने का कोई औचित्य प्रकट नहीं होता है। अतः आरोपी के विरूद्ध कार्रवाई करने के लिये पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं होने के कारण परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद खारिज किया जाता है।’

आदेश के अनुसार, ‘अंकित तथ्यों का अवलोकन करने से यह प्रकट होता है कि परिवादी आशीष सैनी जो कि स्वयं एक अधिवक्ता है की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है तथा उसने अपनी मानसिक स्थिति के सम्बन्ध में किसी चिकित्सक से उपचार नहीं करवा कर आरोपी अशोक गहलोत का अपनी मानसिक स्थिति के लिये जिम्मेदार मानते हुए उनके विरुद्ध न्यायालय में परिवाद पेश किया है।’

अदालत के अनुसार परिवादी आशीष सैनी द्वारा प्रस्तुत हस्तगत निगरानी अन्तर्गत दंप्रसं धारा 397 व 399 स्वीकार स्वीकार किये जाने योग्य नहीं होने से इसे खारिज किया जाता है। इस मामले में अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित आदेश की पुष्टि की जाती है।

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