खालिस्तान के नाम लेवा की वापसी…

डे नाईट न्यूज़ | कुछ वर्षों पहले तक लग रहा था कि खालिस्तान के नाम लेवा शायद अब नहीं बचे हैं और गिने-चुने जो स्वयंभू नेता विदेशों में रह रहे हैं, वे भी ठंडे पड़ चुके होंगे। लेकिन 2018 में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में भारत के स्वतंत्रता दिवस से तीन दिन पहले खालिस्तान समर्थक संगठन सिख फॉर जस्टिस ने जो रैली निकाली, वह भारत के लिए गंभीर खतरे का संकेत था। इस रैली से तथाकथित खालिस्तान समर्थक नेताओं ने अपनी मौजूदगी का अहसास कराने की कोशिश की थी। इसके जरिए यह संदेश दिया गया था कि अलग राष्ट्र की मांग को लेकर खालिस्तान समर्थकों की लड़ाई खत्म नहीं हुई है। अब इस रैली का असर भारत में दिखने लगा है। हाल की घटनाओं को देखें तो कई में खालिस्तान का नाम सामने आया है। जजों को धमकी, करनाल में 4 आतंकियों का पकड़ा जाना, पटियाला में शिवसैनिकों के साथ झड़प या अब हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बाहर झंडे लगाना, सारी कवायद अचानक हुई नहीं है। अगर ताजा घटनाक्रम को देखें तो रविवार सुबह धर्मशाला में हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मुख्य द्वार और चारदीवारी पर खालिस्तान के झंडे बंधे मिले थे। दोषियों ने विधानसभा परिसर के भीतरी इलाकों में पुलिस की तैनाती का फायदा उठाकर दीवारों और गेट पर झंडे लगा दिए। विधानसभा परिसर के अंदरूनी हिस्सों में पुलिस तैनात हैं, क्योंकि यह बहुत बड़ा है। इसलिए पोस्टर को दीवार और विधानसभा के मुख्य द्वार पर लगाया गया। जांच में क्या सामने आएगा, यह बाद में पता चलेगा मगर अभी जिस तरह से इस तरह की हरकतें बढ़ी हैं, वह चिंता बढ़ाने वाली हैं। 1990 के दशक में पंजाब के सुपरकॉप केपीएस गिल ने सख्ती से निपटते हुए पंजाब को खालिस्तानी आतंकवादियों से मुक्ति दिलवाने में अहम भूमिका अदा की थी। लेकिन अब ये लोग फिर सिर उठाने लगे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि खालिस्तान की मांग को लेकर भारत को अस्थिर करने की कोशिश करने वाले बचे-खुचे नेता ऐसा करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। लेकिन गंभीर सवाल यह है कि ढाई दशक बाद फिर से खालिस्तान की मांग को जो हवा दी जा रही है, उसके पीछे आखिर कौन है? सिख फॉर जस्टिस को योजनाबद्ध तरीके से पाला-पोसा जा रहा है। मानवाधिकार संगठन होने का दावा करने वाले इस संगठन के साथ ब्रिटेन की वामपंथी ग्रीन पार्टी खड़ी है। हाउस ऑफ कॉमन्स में इस पार्टी की एकमात्र निर्वाचित नेता कैरोलीन लुकास ने खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में यहां तक कहा था कि सिख लोगों को यह निर्धारित करने का हक है कि वे अपने लिए स्वतंत्र पंजाब चाहते हैं। जाहिर है, ब्रिटेन की धरती पर खालिस्तानी नेताओं की पौध तैयार करने का काम चल रहा है। योजना लंबी है कि कब क्या करना है। इससे लोगों के मन में फिर से यह बात बैठेगी कि सिखों का अलग देश खालिस्तान होना चाहिए। भारत ने करीब डेढ़ दशक तक पंजाब के आतंकवाद को झेला है और इसकी भारी कीमत चुकाई है। हजारों निर्दोष भारतीय नागरिक आतंकवादियों की हिंसा का शिकार हुए। अब इस दौर में खालिस्तान की मांग करने वालों की आवाज उस देश से आई है जो आतंकवाद के खात्मे में हर तरह से भारत के साथ होने का दावा करता रहा है और खुद भी इसके खतरों से दो-चार रहा है। सिख फॉर जस्टिस यूरोप के कई देशों में सक्रिय है। अमेरिका और कनाडा में इसके तार हैं। इस साल फरवरी में कनाडा के प्रधानमंत्री के साथ खालिस्तान समर्थक जसपाल अटवाल के संपर्कों का खुलासा भी कम चौंकाने वाला नहीं था। अटवाल 1986 में पंजाब के एक मंत्री की हत्या में दोषी करार दिया गया था और अब कनाडा का नागरिक है। इस तरह की गतिविधियां जिस तेजी से सिर उठा रही हैं, उसे लेकर भारत सरकार को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। भारत को उन देशों की सरकारों पर भी दबाव बनाना होगा जहां खालिस्तान के नाम पर आज भी गतिविधियां जारी हैं।

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