पीएम की अपील, कोरोना का खतरा…

डे नाईट न्यूज़ देश में कोरोना के बढ़ते केस को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वर्चुअल मीटिंग की। इसमें महामारी और यूक्रेन-रूस जंग के कारण देश की आर्थिक स्थिति पर हुए असर को लेकर भी चर्चा हुई। पीएम ने राज्यों से उनके हिस्से का टैक्स घटाने की अपील की है, ताकि जनता पर महंगाई का बोझ कम किया जा सके। पीएम ने इस दौरान पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर विरोधी राज्य सरकारों पर निशाना भी साधा। उन्होंने कई राज्यों में पेट्रोल की कीमतों का अंतर गिनाया। कहा-मुंबई में 120 रुपए लीटर पेट्रोल है, जबकि पड़ोस के ही केंद्र शासित प्रदेश दमन दीव में यह 102 रुपए है। इसी तरह तमिलनाडु में 111 रुपए तो जयपुर में 118 रुपए लीटर है। आज भारत की अर्थव्यवस्था में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सामंजस्य पहले से ज्यादा आवश्यक है। युद्ध के माहौल में दिनों-दिन चुनौतियां लेकर आया है। ऐसे संकट के समय में केंद्र और राज्यों के बीच में तालमेल को बढ़ाना और अनिवार्य हो गया है। जैसे पेट्रोल-डीजल की कीमतों का विषय सबके सामने है। पीएम ने देशवासियों पर इनकी बढ़ती कीमतों का बोझ कम करने के लिए राज्यों से आग्रह किया था कि वे अपने यहां टैक्स कम करें, इसके बाद कुछ राज्यों ने तो टैक्स कम कर दिया, लेकिन कुछ राज्यों ने अपने नागरिकों को इसका लाभ नहीं दिया, इसलिए इन राज्यों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा हैं। पीएम की टैक्स कम करने की अपील ऐसे समय आई है जब महंगाई को लेकर विपक्ष हमलावर है, जनता परेशान है। रोज डीजल और पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, रसोई गैस और वाहनों में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस यानी सीएनजी की कीमतें भी थोड़े-थोड़े अंतराल पर बढ़ जा रही हैं। कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते तेल आपूर्ति में रुकावट आने की वजह से यह स्थिति पैदा हुई है। मगर पांच राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव के मद्देनजर करीब तीन महीने तक ईंधन की कीमतों की समीक्षा रोके रखी गई। उनमें कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। यहां तक कि उस दौरान केंद्र ने उत्पाद शुल्क में कटौती कर तेल की कीमत घटाई थी। जबकि उस दौरान भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊपर थीं। तब स्वाभाविक ही पूछा जा रहा है कि अगर सरकार चुनाव के समय तेल की कीमतों पर नियंत्रण कर सकती है, तो बाद में क्यों नहीं। विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद से डीजल और पेट्रोल की कीमतें अब तक थोड़ा-थोड़ा करके सात रुपए से अधिक बढ़ चुकी हैं। इसी तरह प्राकृतिक गैस यानी सीएनजी की कीमतों में दो बार बढ़ोतरी हो चुकी है। ईंधन के दाम में बढ़ोतरी की मार सबसे अधिक गरीब, मध्यवर्ग और छोटे कारोबारियों पर पड़ती है। घरेलू गैस का सिलेंडर एक हजार रुपए से पार पहुंच गया है। व्यावसायिक सिलेंडर की कीमत पिछले एक महीने में दो बार बढ़ चुकी है। इसी तरह पाइप के जरिए घरों में पहुंचने वाली रसोई गैस यानी पीएनजी की कीमत पांच रुपए प्रति घन मीटर बढ़ा दी गई है। खुदरा और थोक महंगाई इस समय अपने शिखर पर है। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिसे लेकर आम लोग परेशान हैं। तिस पर तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से उन पर अतिरिक्त मार पड़नी शुरू हो गई है। तेल की कीमतें बढ़ने से केवल उन लोगों की जेब पर असर नहीं पड़ता, जो बड़ी गाड़ियों में चलते हैं, बल्कि दोपहिया, तिपहिया और सार्वजनिक वाहनों से चलने वालों पर भी इसका असर पड़ता है। माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है, तो उसकी मार हर वर्ग पर पड़ती है। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। इसी तरह व्यावसायिक सिलेंडर की कीमत बढ़ने से छोटे स्तर के बहुत सारे कारोबारियों पर मार पड़ी है। खान पान की दुकान चलाने वालों के सामने संकट है कि अगर वे अपनी वस्तुओं की कीमत बढ़ाते हैं, तो ग्राहक घटने की आशंका रहती है और न बढ़ाएं तो घाटा उठाना पड़ता है। इस समय तेल पर करीब सत्ताईस रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क वसूला जाता है। अगर सरकार केवल उसमें कटौती कर दे, तो कीमत नियंत्रण में आ जाएगी। मगर उसका ऐसा इरादा दिख नहीं रहा।

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