किसको लेकर बना विवाद का नया मुद्दा…

डे नाईट न्यूज़ | पंजाब में विवाद छिड़ गया कि केजरीवाल ही पंजाब के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। इसके बाद दबाव बनने लगा कि आम आदमी पार्टी पंजाब में अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। बेचारे केजरीवाल! जब तक हो सका, इससे बचते रहे। लेकिन जब चुनाव की तिथि सिर पर ही आ गई तो लगा कि कहीं मुख्यमंत्री का चेहरा न घोषित करना भी 2017 का लुधियाना कांड ही न बन जाए। इसलिए मन मार कर केजरीवाल को कहना पड़ा कि यदि पंजाब के लोग आम आदमी पार्टी को जिता देंगे तो पार्टी भगवंत मान को मुख्यमंत्री बना देगी। इस हालात में भगवंत मान पंजाब के मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन केजरीवाल ने उनके गले में दिल्ली मॉडल का कमंडल लटका दिया। केजरीवाल नहीं समझ रहे कि किसी शहर का प्रशासन चलाना और किसी सूबे का प्रशासन चलाना एक ही बात नहीं है। दिल्ली के जिन स्कूलों की बात केजरीवाल कर रहे हैं, उनकी हालत दिल्ली वाले भी जानते हैं और पंजाब वाले भी, क्योंकि दिल्ली पंजाब से बहुत दूर नहीं है। अब भगवंत मान यह मॉडल ढोने के लिए विवश हैं…

पंजाब सरकार ने केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली की सरकार से एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके अनुसार पंजाब सरकार दिल्ली नगर की सरकार से शासन के विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान प्राप्त करेगी। केजरीवाल बार-बार कहते रहते हैं कि वे राजनीति को नहीं जानते लेकिन वे दो क्षेत्रों में माहिर हैं। स्कूल बनाने में और अस्पताल बनाने में। अब वे जिससे भी मिलते हैं उससे यही कहते हैं कि मुझसे ये ज्ञान प्राप्त करके अपने-अपने राज्य का भाग्य चमका लो। लेकिन कुछ लोग इसकी थोड़ी गहरी व्याख्या करते हैं। उनके अनुसार केजरीवाल अन्ना आंदोलन के रथ पर सवार होकर देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। इसीलिए वे सीधे वाराणसी में जाकर नरेंद्र मोदी के मुकाबले अखाड़े में उतर गए। वहां उनका जो हश्र हुआ वह बताने की जरूरत नहीं। ज़ाहिर है अन्ना आंदोलन के माध्यम से बनी अपनी छवि का मूल्यांकन उन्होंने जरूरत से ज्यादा कर लिया था। कांग्रेस की गलत रणनीति से या फिर दिल्ली प्रदेश भाजपा की अंदरूनी कलह से दिल्ली नगर की सरकार किसी तरह उनके कब्जे में आ गई थी। यदि वे चाहते तो मन लगा कर दिल्ली में कुछ करते। लेकिन उनका मन तो प्रधानमंत्री के पद पर लगा हुआ था।

तब उन्हें लगा कि नरेंद्र मोदी को हर काम के लिए कोसते रहने से शायद राजनीति में केजरीवाल बनाम नरेंद्र मोदी की इबारत लिखी जा सकती है। वे इसी काम में लग गए। लेकिन फिर अचानक उन्होंने यह बनाम वाला रास्ता छोड़ दिया। किसी प्रशांत किशोर नुमा सलाहकार ने शायद सलाह दी हो कि पानी की गहराई नापे बिना छलांग लगा देने से डूबने का ख़तरा बढ़ जाता है। लेकिन राजनीति का रास्ता ही ऐसा है कि चंचल मन टिकता नहीं, दसों दिशाओं में भागता है। भारत के प्रधानमंत्री न सही, किसी पूरे प्रांत का मुख्यमंत्री तो बनना ही चाहिए। केजरीवाल हरियाणा के रहने वाले हैं। पूरे प्रांत का मुख्यमंत्री बनने का निश्चय करके उन्होंने हरियाणा वालों को बार-बार सूचना देना शुरू कर दिया कि मैं भी हरियाणा का ही निवासी यानी शुद्ध हरियाणवी हूं। आज का युग भी सूचना का युग ही कहा जाता है। यह भी माना जाता है कि असली ताकत सूचना क्रांति में ही है। यही सोच समझ कर उन्होंने अपने हरियाणवी होने की सूचना क्रांति कर दी। लेकिन जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि यह पूर्वकाल में चौधरी देवी लाल की कृपा से कुछ महीने के लिए हरियाणा का मुख्यमंत्री बन पाना बनारसी दास गुप्ता के भाग्य में ही लिखा था, केजरीवाल के लिए यह संभव नहीं था। केजरीवाल की यह ख़ूबी है कि जब वे अपने रास्ते में रुकावट देख लेते हैं तो वहां देर तक माथा नहीं फोड़ते बल्कि बाईपास तलाशते हैं। उन्होंने जल्दी ही पंजाब को तलाश लिया। 2017 के विधानसभा चुनावों में उन्हें लगा कि वे पंजाब के मुख्यमंत्री बन सकते हैं। इसका ख़ुलासा उन्हीं के साथी रह चुके घर के भेदी कुमार विश्वास ने बहुत बाद में किया भी।

रणनीति बहुत साफ थी। विदेश स्थित अलगाववादियों की माया और सहायता से पंजाब फतह किया जाए। बाद में विधायकों में मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद बढ़ेगा तो वह ताज विवाद समाप्त करने के नाम पर स्वयं अपने सिर पर रख लिया जाए। इसे केजरीवाल का दुर्भाग्य और पंजाब का सौभाग्य ही कहा जाएगा कि चुनाव से पूर्व ही लुधियाना कांड ने केजरीवाल के षड्यंत्र का पर्दाफाश कर दिया और केजरीवाल की पार्टी बीस के आसपास सिमट गई और कांग्रेस बाजी मार गई। पांच साल केजरीवाल गुजरात, हिमाचल और गोवा इत्यादि में भटकते रहे, लेकिन हाथ बल्ले कुछ नहीं पड़ा। लेकिन एक बात माननी पड़ेगी। केजरीवाल जि़द्दी हैं। पांच साल बाद उन्होंने फिर पंजाब की ओर मुंह मोड़ा। इस बार अलबत्ता यह ध्यान रखा कि लुधियाना कांड जैसे एपिसोड से बचा जाए। उससे तो वे बच गए। लेकिन एक नए पचड़े में फंस गए। उन्होंने पंजाब में पंजाबियों को अपील करते हुए दीवारें काली कर दीं कि पंजाब में एक मौका केजरीवाल को भी दो। जाहिर है पंजाब में विवाद छिड़ गया कि केजरीवाल ही पंजाब के मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। इसके बाद दबाव बनने लगा कि आम आदमी पार्टी पंजाब में अपना मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करे। बेचारे केजरीवाल! जब तक हो सका, इससे बचते रहे। लेकिन जब चुनाव की तिथि सिर पर ही आ गई तो लगा कि कहीं मुख्यमंत्री का चेहरा न घोषित करना भी 2017 का लुधियाना कांड ही न बन जाए। इसलिए मन मार कर केजरीवाल को कहना पड़ा कि यदि पंजाब के लोग आम आदमी पार्टी को जिता देंगे तो पार्टी भगवंत मान को मुख्यमंत्री बना देगी। इस हालात में भगवंत मान पंजाब के मुख्यमंत्री तो बन गए, लेकिन केजरीवाल ने उनके गले में दिल्ली मॉडल का कमंडल लटका दिया।

केजरीवाल नहीं समझ रहे कि किसी शहर का प्रशासन चलाना और किसी सूबे का प्रशासन चलाना एक ही बात नहीं है। दिल्ली के जिन स्कूलों की बात केजरीवाल कर रहे हैं, उनकी हालत दिल्ली वाले भी जानते हैं और पंजाब वाले भी क्योंकि दिल्ली पंजाब से बहुत दूर नहीं है। दिल्ली के किसी एक आध स्कूल को चमका देने से मॉडल नहीं बन जाता। दिल्ली में जितने टीचर हैं, पंजाब में उससे कहीं ज्यादा स्कूल ही हैं। लेकिन भगवंत मान क्या करें? उन्हें केजरीवाल का यह कमंडल खटखटाना पड़ रहा है। पर केजरीवाल इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने पंजाब सरकार को विवश किया कि वह दिल्ली शहर की सरकार से एक समझौता करे, जिसके अनुसार केजरीवाल पंजाब की सरकार में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर सकें। अब वह समझौता हो गया है, जिसके अनुसार पंजाब सरकार के आला अफसर केजरीवाल से सीधे आदेश ले सकते हैं। केजरीवाल ज्ञान दे रहे हैं। वे सीधे तो पंजाब के मुख्यमंत्री बन नहीं सके, अब वे परोक्ष रूप से पंजाब के मुख्यमंत्री बनने की साध पाल रहे हैं। पंजाब में इसी को लेकर विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। वैसे एक बार बाबा साहिब अंबेडकर ने कांग्रेस के बारे में कहा था कि कांग्रेस देश की आजादी के लिए किसी विचारधारा के आधार पर संघर्ष नहीं कर रही, बल्कि उसका संघर्ष महज सत्ता प्राप्ति के लिए है। लगता है अंबेडकर की यह उक्ति केजरीवाल और उसकी पार्टी पर कहीं सटीक बैठती है। केजरीवाल किसी वैचारिक आधार पर संघर्ष नहीं कर रहे। वे किसी भी तरह सत्ता हथियाना चाहते हैं। इस मामले में फोर्ड फाऊंडेशन इत्यादि की भूमिका की भी जांच कर लेनी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार है)

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