अल्लाह की तरफ़ से नूर आया और रौशन किताब – मौलाना अली अहमद

गोरखपुर, उत्तर प्रदेश।

‘महफिल-ए-मिलादुन्नबी’ पर बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में मौलाना अली अहमद ने कहा कि ‘मिलाद’ अरबी लफ़्ज है जिसका अर्थ विलादत या पैदाइश होता है। पैग़ंबर-ए-आज़म हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सीरत, सूरत, किरदार, व्यवहार, बातचीत व अन्य क्रियाकलाप, मेराज, मोज़ज़ों का बयान ही मिलाद-ए-पाक में बयान होता है। पैग़ंबर-ए-आज़म की विलादत (जन्मदिवस) की ख़ुशी मनाना यह सिर्फ इंसान की ही खासियत नहीं है बल्कि तमाम कायनात उनकी विलादत की खुशी मनाती है बल्कि खुद रब्बे क़ायनात मेरे मुस्तफा जाने रहमत का मिलाद पढ़ता है। पूरा क़ुरआन ही मेरे आका की शान से भरा हुआ है।
उन्होंने कहा कि अल्लाह क़ुरआन में इरशाद फरमाता है “वही है जिसने अपना रसूल हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा” दूसरी जगह अल्लाह इरशाद फरमाता है “बेशक तुम्हारे पास तशरीफ़ लाये तुममें से वो रसूल जिन पर तुम्हारा मशक़्क़त में पड़ना गिरां (तकलीफ) है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानों पर कमाल मेहरबान”। पहली आयत में अल्लाह उन्हें भेजने का ज़िक्र कर रहा है और भेजा उसे जाता है जो पहले से मौजूद हो मतलब साफ़ है कि पैग़ंबर-ए-आज़म पहले से ही आसमान पर या अर्शे आज़म पर या जहां भी अल्लाह ने उन्हें रखा वो वहां मौजूद थे, और दूसरी आयत में उनके तशरीफ़ लाने का और उनके औसाफ़ का भी बयान फरमा रहा है। यही तो मिलाद है। अल्लाह फरमाता है “बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से एक नूर आया और रौशन किताब”। यहां नूर से मुराद पैगंबर-ए-आज़म हैं और किताब से मुराद क़ुरआन-ए-मुक़द्दस है।
अंत में सलातो सलाम पढ़कर दुआ मांगी गई। शीरीनी बांटी गई। महफिल में अली गज़नफर शाह अज़हरी, सैयद रफीक हसन, मो. ज़ैद, मो. फैज़, मो. आसिफ, मो. अरशद, मो. तैयब, तौसीफ खान, मो. लवी, अली कुरैशी, मो. रफीज, सैयद मारूफ आदि शामिल हुए।

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